Tuesday, January 1, 2019

रामकृष्ण परमहंस का जीवन परिचय

रामकृष्ण परमहंस भारत के बहुत प्रसिद्ध संत में से एक हैं . स्वामी विवेकानंद जी इनके विचारों से प्रेरित थे, इसी कारण विवेकानंद जी ने इन्हें अपना गुरु माना और इनके विचारों को गति प्रदान करने के लिए रामकृष्ण मठ की स्थापना की जो कि बेलूर मठ के द्वारा संचालित हैं . रामकृष्ण मठ और मिशन नामक यह संस्था जन मानुष के कल्याण के लिए एवं उनके आध्यात्मिक विकास के लिए दुनियाँ भर में काम करती हैं.

19 शताब्दी में धार्मिक क्षेत्र में श्री रामकृष्ण परमहंस – Ramakrishna Paramahansa सबसे उचे स्थान पर विराजमान थे वह एक रहस्यमयी और महान योगी पुरुष थे जिन्होंने काफी सरल शब्दों में अध्यात्मिक बातो को सामान्य लोगो के सामने रखा। जिस समय हिन्दू धर्म बड़े संकट में फस गया था उस समय श्री रामकृष्ण परमहंस ने हिन्दू धर्मं में एक नयी उम्मीद जगाई। श्रीरामकृष्ण परमहंस के पास में अद्भुत शक्तिया थी। ऐसा कहा जाता है की श्री रामकृष्ण परमहंस भगवान विष्णु के अवतार थे।


श्री रामकृष्ण परमहंस की जीवनी – Ramakrishna Paramahansa Biography


श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म सन 1836 में बंगाल के गाव के परिवार में हुआ था। उनके घर में पाच बच्चे थे जिनमे श्री रामकृष्ण परमहंस चौथे नंबर पर थे। उनके माता पिता बहुतही सरल स्वभाव के थे मगर ब्राह्मण होने की वजह से वह काफी धार्मिक थे।

असली  नाम  – गदाधर 
जन्म         – 18  फरवरी 1836 
मृत्यु         – 16  अगस्त 1886 
पिता       – खुदीराम 
पत्नी        – शारदामणि
कर्म       – संत उपदेशक 
कर्म स्थान    – कलकत्ता 
शिष्य   – स्वामी विवेकानंद 


विवाह एवम ईश्वरभक्ति 

इनका बाल विवाह शारदामणि से हुआ था लेकिन इनके मन में स्त्री को लेकर केवल एक माता भक्ति का ही भाव था इनके मन में सांसारिक जीवन के प्रति कोई उत्साह नहीं था इसलिए ही सत्रह वर्ष की उम्र में इन्होने घर छोड़कर स्वयं को माँ काली के चरणों में सौंप दिया . यह दिन रात साधना में लीन रहते थे . इनकी भक्ति को देख सभी अचरज में रहते थे . इनका कहना था कि माँ काली इनसे मिलने आती हैं. वे उन्हें अपने हाथों से भोजन कराते हैं . जब भी माँ कली उनके पास से जाती वे तड़पने लगते और एक बच्चे की भांति अपनी माँ की याद में रुदन करते . उनकी इसी भक्ति के कारण वे पूरी गाँव में प्रसिद्द थे . लोग दूर- दुरे से उनके दर्शन को आते थे और वे स्वयं दिन रात माँ काली की भक्ति में रहते थे .

जब एक बार श्री रामकृष्ण परमहंस के पिताजी खुदीराम गया के लिए तीर्थयात्रा पर जा रहे थे तो उन्हें भगवान विष्णु का दृष्टान्त हुआ और उसमे भगवान विष्णु ने कहाँ की उनका जो अगला लड़का होंगा उसके रूप में खुद भगवान विष्णु अवतार लेने वाले है।

ठीक उसी तरह ही रामकृष्ण की माँ चन्द्र देवी को भी भगवान विष्णु ने सपने में आकर कहा की उनका जो अगला बच्चा होगा वह दैवी गुणों से संपूर्ण होगा और वह भगवान के समान ही होगा। उसके कुछ ही समय बाद चन्द्र देवी ने श्री रामकृष्ण परमहंस को जन्म दिया।

एक आम बच्चे की तरह ही श्री रामकृष्ण परमहंस को स्कूल में जाना, पढ़ना, लिखना बिलकुल अच्छा नहीं लगता था। बचपन से ही उन्हें अध्यात्म में अधिक रुची थी। कम उम्र से ही वह लम्बे समय तक विचार करते थे। बचपन से ही उन्हें भारतीय अध्यात्म से जुड़े नाट्य में अधिक रुची थी।

जब बंगाल में सब तरफ़ लोग ब्राह्मण और ख्रिश्चन धर्म की और बहुत ज्यादा आकर्षित हो रहे थे और हिन्दू धर्मं पूरी तरह से खतरे में था उस समय श्री रामकृष्ण परमहंस ने हिन्दू धर्म को ख़तम होने से बचाया ही नहीं बल्की हिन्दू धर्मं को इतना शक्तिशाली बनाया की लोगो को फिर से एक बार हिन्दू धर्म अपनी और आकर्षित करने लगा था।


संत से परमहंस बनने तक की कहानी (existence story)


रामकृष्ण जी के परमहंस उपाधि प्राप्त करने के पीछे कई कहानियाँ हैं . परमहंस एक उपाधि हैं यह उन्ही को मिलती हैं जिनमे अपनी इन्द्रियों को वश में करने की शक्ति हो. जिनमे असीम ज्ञान हो और यही उपाधि रामकृष्ण जी को प्राप्त हुई और वे रामकृष्ण परमहंस कहलाये .

रामकृष्ण एक प्रचंड काली भक्त थे जो माँ काली से एक पुत्र की भांति जुड़े हुए थे जिनसे उन्हें अलग कर पाना ना मुमकिन था . जब रामकृष्ण माता काली के ध्यान में जाते और उनके संपर्क में रहते तो वे नाचने लगते. गाने लगते और झूम- झूम कर अपने उत्साह को दिखाते लेकिन जैसी ही संपर्क टूटता वो एक बच्चे की तरह विलाप करने लगते और धरती पर लोट पोट करने लगते . उनकी इस भक्ति के चर्चे सभी जगह थे . उनके बारे में सुनकर संत तोताराम जो कि एक महान संत थे वो रामकृष्ण जी से मिलने आये और उन्होंने स्वयं रामकृष्ण जी को काली भक्ति में लीन देखा . तोताराम जी ने रामकृष्ण जी को बहुत समझाया कि उनमे असीम शक्तियाँ हैं जो तब ही जागृत हो सकती हैं जब वे अपने आप पर नियंत्रण रखे . अपनी इन्द्रियों पर अपना नियंत्रण रखे लेकिन रामकृष्ण जी अपनी काली माँ के प्रति अपने प्रेम को नियंत्रित करने में असमर्थ थे . तोताराम जी उन्हें कई तरह से मनाते लेकिन वे एक ना सुनते . तब तोताराम जी ने रामकृष्ण जी से कहा कि अब जब भी तुम माँ काली के संपर्क में आओ तुम एक तलवार से उनके तुकडे कर देना . तब रामकृष्ण ने पूछा मुझे तलवार कैसे मिलेगी ? तब तोताराम जी ने कहा – अगर तुम अपनी साधना से माँ काली को बना सकते हो. उनसे बाते कर सकते हो. उन्हें भोजन खिला सकते हो. तब तुम तलवार भी बना सकते हो . अगली बार तुम्हे यही करना होगा . अगली बार जब रामकृष्ण जी ने माँ काली से संपर्क किया तब वे यह नहीं कर पाए और वे पुनः अपने प्रेम में लीन हो गए . जब वे साधना से बाहर आये तब तोताराम जी ने उनसे कहा कि तुमने क्यूँ नहीं किया . तब फिर से उन्होंने कहा कि अगली बार जब तुम साधना में जाओगे तब मैं तुम्हारे शरीर पर गहरा आघात करूँगा और उस रक्त से तुम तलवार बनाकर माँ काली पर वार करना . अगली बार जब रामकृष्ण जी साधना में लीन हुए. तब तोताराम जी ने रामकृष्ण जी के मस्तक पर गहरा आघात किया जिससे उन्होंने तलवार बनाई और माँ काली पर वार किया . इस तरह संत तोताराम जी ने रामकृष्ण जी को अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना सिखाया .

रामकृष्ण जी ने कई सिद्धियों को प्राप्त किया. अपनी इन्द्रियों को अपने वश में किया और एक महान विचारक एवं उपदेशक के रूप में कई लोगो को प्रेरित किया . उन्होंने निराकार ईश्वर की उपासना पर जोर दिया . मूर्ति पूजा को व्यर्थ बताया . उनके ज्ञान के प्रकाश के कारण ही इन्होने नरेंद्र नाम के साधारण बालक जो कि आध्यात्म से बहुत दूर. तर्क में विश्वास रखने वाला था. को आध्यात्म का ज्ञान कराया. ईश्वर की शक्ति से मिलान करवाया और उसे नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद बनाया . राष्ट्र को एक ऐसा पुत्र दिया जिसने राष्ट्र को सीमा के परे सम्मान दिलाया. जिसने युवावर्ग को जगाया और रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर देश जागरूकता का अभियान चलाया और अपने गुरु को गुरुभक्ति दी .


दक्षिणेश्वर मंदिर में श्री रामकृष्ण परमहंस एक पुजारी के रूप में

जब श्री रामकृष्ण परमहंस sixteen साल के थे तो उनके भाई रामकुमार उनके काम में हात बटाने के लिए कोलकाता लेके गए थे। सन 1855 में राणी रासमणि ने दक्षिणेश्वर में देवी काली का मंदिर बनवाया था और उस मंदिर में रामकुमार एक मुख्य पुजारी थे। जब उनकी मृत्यु हो गयी तो श्री रामकृष्ण परमहंस को उस मंदिर का पुजारी बना दिया गया।

श्री रामकृष्ण पूरी तरह से काली के ध्यान में लीन हो जाते थे और बहुत सारे घंटो तक देवी का ही ध्यान करते थे, इस दौरान वह एक पुजारी की जो जिम्मेदारिया होती थी उसे भी भूल जाते थे। धीरे धीरे श्री रामकृष्ण परमहंस देवी काली के ध्यान में इतने व्यस्त रहते थे की उन्हें देवी के चारो तरफ़ भव्य आभा दिखने लगी थी।


श्री रामकृष्ण परमहंस द्वारा दी गयी शिक्षा – Sri Ramakrishna Paramahamsa training


श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपने पुरे जीवन में एक भी किताब नहीं लिखी और नाही कभी कोई प्रवचन दिया। वह प्रकृति और रोज के जिंदगी के उदहारण लेकर बहुत ही सरल भाषा में लोगो को समझाते थे। परमहंस जब भी कुछ सिख देते थे तो लोग अपने आप उनकी तरफ़ आकर्षित हो जाते थे। उन्होंने जितनी भी शिक्षा दी उसको उनके शिष्य महेन्द्रनाथ गुप्ता ने बंगाली भाषा में ‘श्री श्री रामकृष्ण कथाम्रिता’ किताब में लिखा है।

उनकी दी गयी शिक्षा पर सन 1942 में ‘द गोस्पेल ऑफ़ श्री रामकृष्ण’ नाम की इंग्लिश में किताब भी प्रकाशित की गयी। यह किताब आज भी सभी को उतनी ही आकर्षित करती है जीतनी पहले करती थी।


श्री रामकृष्ण परमहंस के भक्त – Devotees of Sri Ramkrishna Paramahansa


जिस तरह से एक फुल के चारो तरफ़ मधुमख्खिया घुमती रहती है ठीक उसी तरह श्री रामकृष्ण को मिलने के लिए उनके भक्त आते रहते थे। उन्होंने अपने भक्तों को दो मुख्य हिस्सों में विभाजित किया था। उनके कुछ भक्त गृहस्ती सँभालने वाले थे। उन्हें वह सिखाते थे की परिवार की जिम्मेदारी सँभालने के साथ साथ किस तरह से भगवान की अनुभूति की जा सकती है।

उनका भक्तों का दूसरा अहम वर्ग था वह मध्यम वर्ग के युवा का था। उन्हें वह भिक्षुक बनाने की पूरी शिक्षा देते थे और उनके माध्यम से अपना सन्देश समाज के हर कोने में पहुचाना चाहते थे। उन भिक्षुको में सबसे पहले शिष्यों में नरेन्द्रनाथ का भी नाम आता है जिन्हें आज सभी स्वामी विवेकानंद नाम से जानते है।

स्वामी विवेकानंद ने ही वेदांत का सन्देश पूरी दुनिया में पहुचाया, उन्होंने ही एक बार फिर से हिन्दू धर्म की जाग्रति की, भारत के सभी लोगो को फिर से नींद से जगाने का काम किया। उन्होंने ही रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी और अपने गुरु का कार्य जारी रखने का कार्य किया था।


श्री रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु – dying of Shri Ramkrishna Paramahansa

सन 1885 में श्री रामकृष्ण परमहंस को गले का कैंसर हुआ था। कलकता में अच्छे डॉक्टर से उपचार कराने के लिए उनके भक्त श्यामपुकुर के घर में रखा गया था। लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा था उसके साथ साथ उनकी तबियत भी अधिक ख़राब होती गयी। उसके बाद में उन्हें कोसिपुर के बड़े घर में रखा गया। मगर फिर भी उनकी तबियत अधिक बिगडती गयी और 16 अगस्त 1886 में कोसिपुर के घर में उनकी मृत्यु हो गयी।

उनकी मृत्यु के बाद भी उनका प्रभाव ख़तम नहीं हुआ बल्की उनके जो सबसे प्रभावी शिष्य स्वामी विवेकानंद थे उन्होंने अपने गुरु द्वारा दी गयी शिक्षा और तत्वज्ञान को रामकृष्ण मिशन की सहायता से प्रसार करने का कार्य जारी रखा। उनकी जो शिक्षा थी वह पुराने ऋषि मुनियों की तरह ही थी लेकिन उन्होंने जो ज्ञान दिया था वह किसी भी समय में उपयोगी साबित हुआ है।


रामकृष्ण परमहंस अनमोल वचन  (Ramakrishna Paramahamsa quotes )

  • ख़राब आईने में जैसे सूर्य की छवि दिखाई नहीं पड़ती. वैस ही ख़राब मन में भगवान की मूरत नहीं बनती .
  • धर्म सभी समान हैं. वे सभी ईश्वर प्राप्ति का रास्ता दिखाते हैं .
  • अगर मार्ग में कोई दुविधा ना आये तब समझना की राह गलत हैं .
  • जब तक देश में व्यक्ति भूखा और निसहाय हैं. तब तक देश का हर एक व्यक्ति गद्दार हैं .
  • विषयक ज्ञान मनुष्य की बुद्धि को सीमा में बांध देता हैं और उन्हें अभिमानी भी बनाता हैं .

राम कृष्ण परमहंस के कई ऐसे अनमोल वचन हैं जो मनुष्य को जीवन का सही मार्ग दिखाते हैं .

इस ब्लॉग  पर आने और रामकृष्ण परमहंस की लघु जीवनी को पढने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद्. हमें पूरी आशा है कि आपको हमारा यह article बहुत ही अच्छा लगा होगा. यदि आपको इसमें कोई भी खामी लगे या आप अपना कोई सुझाव देना चाहें तो आप नीचे comment ज़रूर कीजिये. इसके इलावा आप अपना कोई भी विचार हमसे remark के ज़रिये साँझा करना मत भूलिए. इस weblog positioned up को अधिक से अधिक percent कीजिये और यदि आप ऐसे ही और रोमांचिक articles, tutorials, courses, rates, mind, slogans, reminiscences इत्यादि कुछ भी हिन्दी में पढना चाहते हैं तो हमें subscribe ज़रूर कीजिये.


तो ऐसे थे  रामकृष्ण परमहंस पोस्ट अच्छी लगे तो जरुर कमेंट में लिखना। और अगर रामकृष्ण परमहंस के बारे में और जानकारी पढ़नी हैं, तो नीचें दियें गयें ebook जरुर पढ़ें 

Download Your Book

1 comment:

BEST MOBILE PHONE IN YOUR BUDGET